Friday, February 20, 2009

मन का घोड़ा

मन का घोड़ा तेज़ बोहोत

बिन सोचे ही उड़ जाता है

लहर लहर लहराता है

हो मस्त ख़ुद पे इतराता है ।

बचो इससे , है नासमझ बोहोत

दौड़ दौड़ रुक जाता है

नशेडी से कदम बढाता है

मनो नृत्य कोई दिखलाता है ।


मन के घोडे की एक लगाम

ज़ोर से अब तुम लो थाम

काबू में गर रखना हो इसे

ढील देने में लो दिमाग से काम ।

5 comments:

  1. rashiji aapki baat jaroor manenge achhi rachna hai

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  2. राशी जी, रचना के बहुत अच्छे भाव हैं।बधाई।

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  3. खयालो को ओर तरतीब से बांधिए ......

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  4. rashi ji hamesha ki tarah lajawab hain is bar bhi aap. khaustaur par aakhri stanza. badhai

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  5. लहर लहर लहराता है ....वाह

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