Sunday, February 8, 2009

आज़ाद गुलाम



खुले आसमान के नीचे हूँ मैं

अपनी मर्जी का मालिक हूँ मैं

दिल जो चाहे करता हूँ मैं

खुश हूँ की आज़ाद हूँ मैं।

सुबह से लेकर शाम तक

काम के बोझ से घायल हूँ मैं

वक़्त ने ऐसा दौडाया है मुझे

पर खुश हु मैं आज़ाद हूँ मैं ।

गर ये रिश्तों के बंधे धागे

और ये काम ज़िम्मेदारी के नाते

कितनो से किए ये कसमे ये वादे

कितने मुनाफे और कितने घाटे

ये सब अगर ज़ंजीर नहीं हैं

गुलाम बनाये बैठी नहीं हैं

हर ओर से मुझको जकडे नहीं हैं

तो सही है शायद आज़ाद हूँ मैं

खुश हूँ मैं आज़ाद हूँ मैं।

7 comments:

  1. आपकी लेखनी की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है ...बहुत सुंदर रचना

    ReplyDelete
  2. अज़ादी किसे नहीं भाती, वाह साहब!

    ---
    गुलाबी कोंपलें

    ReplyDelete
  3. राशिजी,

    अच्छी लगी आपकी सोच.

    ReplyDelete
  4. मुनाफे -घाटे .गमे रोज़गार के मसले....
    खूब कहा .सबका सच कहा ....

    ReplyDelete
  5. बहुत सुंदर कविता.
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  6. Aaj ittefaq se aapka blog mila aur bas pura padhne ke baad hi comment post karna chaha, sach mein aapki poetry ka jawaab nahin, lekin kya ye isi blog tak simit rahega? Please try to make it your profession.
    Great work, really appriciated..
    Keep it up.

    ReplyDelete