Wednesday, February 11, 2009

तेरी माया

खिचता हूँ ओर तेरे
किधर भी मैं चला जाऊं
तेरा जादू हर तरफ़ है फैला
ख़ुद को शिकार इसका मैं पायूँ ।

दी तो तुने जिन्दगी बड़ी खूब मुझको
गमों के सागर में हिचकोले मैं खाऊं ,
पर डूबे जब मझधार में नैय्या मेरी
तुझसे कर गुजारिश सलामत पार लग्वायूं ।

वक़्त बना ही फिसलने को है
रोकना तोह इसको बोहोत मैं चाहूँ
काफ़ी कबड्डी खेल ली वक़्त से मैंने
पर हरदम मैं हारता ही जाऊं ।

माया कैसी रच दी है ये तुमने
जिसकी गिरफ्त से ना मैं बच पायु
माटी से बनाया है तुमने मुझको
अब माटी में ही समाता मैं जाऊं ।

4 comments:

  1. माया कैसी रच दी है ये तुमने
    जिसकी गिरफ्त से ना मैं बच पायु
    माटी से बनाया है तुमने मुझको
    अब माटी में ही समाता मैं जाऊं ।

    सुंदर सत्य कहा आपने

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  2. बहुत सही लिखा है है आपने ...सब कुछ मिलता है उसी कि रहमत से ...और मिटटी में मिल जाता है ...

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  3. bahut hi sunder..
    "माटी से बनाया है तुमने मुझको
    अब माटी में ही समाता मैं जाऊं ।"

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