Friday, February 13, 2009

पानी की ये बूँद

पानी की ये बूँद अगर
सागर से मिले तो अमर बने
अपना अस्तित्व पर खो बैठे ।
पत्ते पे अगर ये जा गिरे
सूरज की किरण से दमक उठे
पर कुछ पल में ही सूख मरे ।
पानी
की ये बूँद अब क्या करे
खो बैठे अपने अस्तित्व को ये
या पत्ते पर दमक कर मर मिटे ?
अमर
रही गुमराह सही , सागर में बेनाम सही
जीती तो रही पर आम सही , क्या ऐसा जीवन ही है सही ?
पत्ते
पे रही अकेली सही , हिम्मत की पोटली भारी रही
कुछ पल दमक कर मर वो गई , क्या ऐसा जीवन ही है सही ?
गर
हर बूंद ये सोच उठे , सागर से मिल हो अमर बनू
सागार तो भर भर जाएगा , पर इधर सूखा पड़ जाएगा ।
गर हर बूंद ये सोच उठे दमक दमक मैं चमक उठू
अकेले बैठ इस पत्ते पे , मैं रानी बन यूं राज करू
सागर खली हो जाएगा , पत्ता पेड़ समेत दूब जाएगा ।
कोई
तो दे इस बूँद को राह सही
जो ख़त्म हो इसके सवाल सभी
मैं तो कुछ भी न सूझा पायी
ख़ुद अबतक राह तलाश रही ।

6 comments:

  1. bohot hi khoooob.

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  2. koi boondh ko kya salah deab,bahut sundar tarike se kavita likhi hai,lajawaab badhai

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  3. bahut khubsurat.
    gar kabhi waqt mile to mere blog par aayen.www.salaamzindadili.blogspot.com

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  4. पानी की बूँद के माध्यम से जीवन को टटोलती आपकी कविता सुंदर लगी.

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  5. कोई तो दे इस बूँद को राह सही ,
    जो ख़त्म हों इसके सवाल सभी.....

    मन की गहरी भावनाओं का बड़े सलीके से किया गया
    बहुत उम्दा इज़हार .........
    बधाई..............................
    ---मुफलिस---

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  6. पानी की बूंद को अपना प्रतीक बना के जो रचना की है. उसका कोइ जवाब नहीं. में अभी तक सोच रहा हूँ के जवाब क्या है. इसके लिए ***** (5Star)

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